Sunday, November 16

आलन्घन

महकते अँधियारों में
मर-मिटने की बात सोची,
झिझक थी तो अपने-आप से
जैसे देव-द्वार की रेखा;

प्रकृति देख रही थी, भावुक,
ज़हन में कविता लिए,
पूछ रही थी, विश्वस्त,
मेरे उत्तर स्वयं ही बोलती;

अभिलाषा का पानी बह गया था,
ले गया था नीति-धर्म के सेतु,
सामने था मैं, प्रतिबिंब बिन काया,
हाथ बढ़ाऊं तो ईश्वर का निवाला|

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